BRICS Summit 2026 america ki tariff niti par bada var pahalgam se UN tak ghoshnapatra mein kya kya

BRICS Summit 2026: अमेरिका की टैरिफ नीति पर बड़ा वार! पहलगाम से UN तक, घोषणापत्र में क्या-क्या?

ब्रिक्स के मंच से निकला एक ऐसा संदेश, जिसने दुनिया की बड़ी ताकतों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। आतंकवाद पर दोहरा रवैया नहीं चलेगा, मनमाने टैरिफ नहीं चलेंगे और अब IMF, World Bank से लेकर UN Security Council तक पुरानी व्यवस्था में बड़े बदलाव की मांग होगी। लेकिन सवाल सबसे बड़ा है—क्या BRICS ने अमेरिका की टैरिफ नीति को सीधी चुनौती दे दी है? और इससे भी बड़ा सवाल, पहलगाम आतंकी हमले पर BRICS ने ऐसा क्या कहा, जिसे भारत के लिए बेहद अहम माना जा रहा है? साथ ही भारत को UN Security Council में स्थायी सदस्यता दिलाने की कोशिशों पर क्या तस्वीर सामने आई? और गाजा से लेकर पश्चिम एशिया, परमाणु सुरक्षा से लेकर वैश्विक व्यापार तक, नई दिल्ली घोषणापत्र में आखिर कौन-कौन से बड़े फैसले हुए? आइए जानते हैं इस पूरे घोषणापत्र की एक-एक बड़ी बात।

नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के बाद जारी साझा घोषणापत्र में आतंकवाद को लेकर बेहद सख्त संदेश दिया गया है। BRICS देशों ने 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की है। इस हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। घोषणापत्र में साफ कहा गया कि आतंकवाद को किसी भी धर्म, राष्ट्रीयता या समुदाय से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। यानी संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—आतंकवाद, आतंकवाद है और उसके खिलाफ कोई बहाना या दोहरा मापदंड नहीं होना चाहिए। BRICS ने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने की अपील की है। साथ ही आतंकवादियों की सीमा पार आवाजाही, आतंकवाद के वित्तपोषण और उनके सुरक्षित ठिकानों को खत्म करने पर भी जोर दिया गया है। एक बेहद अहम मांग यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र के तहत अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि यानी CCIT को जल्द अंतिम रूप देकर लागू किया जाए। यानी भारत जिस मुद्दे को लंबे समय से वैश्विक मंचों पर उठाता रहा है, उस पर BRICS ने एक बार फिर मजबूत संदेश दिया है।

अब बात उस मुद्दे की, जिसने वैश्विक व्यापार को हिला रखा है—टैरिफ। अमेरिका की संरक्षणवादी व्यापार नीतियों पर BRICS ने गंभीर चिंता जताई है। हालांकि घोषणापत्र में किसी देश का नाम सीधे नहीं लिया गया, लेकिन एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं पर कड़ा ऐतराज जताया गया है। BRICS का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा या पर्यावरण जैसे कारणों का इस्तेमाल करके संरक्षणवादी नीतियां लागू करना और WTO के नियमों को दरकिनार करके टैरिफ लगाना वैश्विक व्यापार के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। इसका असर सिर्फ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर नहीं पड़ेगा, बल्कि सप्लाई चेन टूटने से विकासशील और गरीब देशों पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ सकता है। यानी BRICS का संदेश साफ है—व्यापार में मनमानी नहीं, नियम चलेंगे। यही वजह है कि यह घोषणापत्र आने वाले समय में वैश्विक व्यापार की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

BRICS ने बिना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्पष्ट मंजूरी के लगाए जाने वाले एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों पर भी कड़ा रुख दिखाया है। घोषणापत्र के मुताबिक ऐसे प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। BRICS का तर्क है कि इन प्रतिबंधों का सबसे ज्यादा असर आम जनता पर पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होती हैं, खाद्य सुरक्षा पर संकट आता है और गरीब तबके पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। इसलिए ऐसे मनमाने प्रतिबंधों को खत्म करने की मांग की गई है। यानी BRICS ने साफ संकेत दिया है कि आर्थिक दबाव और प्रतिबंधों को वैश्विक राजनीति का हथियार बनाने की नीति पर अब सवाल उठाए जाएंगे।

पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते तनाव को लेकर भी BRICS ने सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने की अपील की है। खास तौर पर शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों और नागरिक बुनियादी ढांचे पर जानबूझकर होने वाले हमलों की निंदा की गई है। BRICS ने साफ कहा कि युद्ध की स्थिति में भी परमाणु सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय मानकों से समझौता नहीं किया जा सकता। क्योंकि परमाणु सुरक्षा से जुड़ी एक छोटी सी गलती सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को संकट में डाल सकती है।

गाजा और फलस्तीन के मुद्दे पर भी BRICS का रुख स्पष्ट रहा। गाजा के मानवीय संकट को लेकर चिंता जाहिर की गई। नागरिक इलाकों और अस्पतालों पर हमलों की निंदा की गई और युद्ध में भुखमरी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का विरोध किया गया। साथ ही फलस्तीनी लोगों के जबरन विस्थापन का विरोध करते हुए 1967 की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र और संप्रभु फलस्तीन राष्ट्र के गठन का समर्थन किया गया है, जिसकी राजधानी पूर्वी यरूशलम हो। इसके अलावा इस्राइल से लेबनान के कब्जे वाले इलाकों से सेना वापस बुलाने और संघर्ष विराम समझौते का पालन करने का आग्रह भी किया गया है।

लेकिन अब आता है भारत के लिए सबसे बड़ा मुद्दा—UN Security Council। क्या भारत की स्थायी सदस्यता की राह मजबूत हो रही है? BRICS घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को ज्यादा लोकतांत्रिक, प्रभावी और प्रतिनिधित्व वाला बनाने की बात कही गई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य रूस और चीन ने सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका और स्थायी सदस्यता की आकांक्षाओं के समर्थन को दोहराया है। इसके अलावा अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों को भी संयुक्त राष्ट्र के महत्वपूर्ण पदों पर ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की जरूरत बताई गई है। यानी BRICS का सवाल सिर्फ भारत का नहीं है, बल्कि पूरी ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने का है।

अब बात IMF और World Bank की। BRICS ने IMF और World Bank जैसे Bretton Woods संस्थानों में सुधार की मांग की है। BRICS देशों का कहना है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं का महत्व पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है, इसलिए उनकी आर्थिक ताकत के हिसाब से उनकी हिस्सेदारी और वोटिंग पावर भी बढ़नी चाहिए। खास तौर पर IMF के कोटा रिव्यू के तहत विकासशील देशों की आवाज मजबूत करने पर जोर दिया गया है। यानी BRICS का संदेश साफ है—जिसकी अर्थव्यवस्था दुनिया को आगे बढ़ा रही है, उसकी आवाज भी वैश्विक फैसलों में ज्यादा मजबूत होनी चाहिए।

वहीं BRICS ने विश्व व्यापार संगठन यानी WTO को मजबूत करने की जरूरत भी बताई है। एक ऐसी व्यापार व्यवस्था की वकालत की गई है जो खुली, निष्पक्ष, पारदर्शी और नियम आधारित हो। साथ ही WTO की विवाद निपटान व्यवस्था को पूरी तरह सक्रिय करने और अपीलीय निकाय के सदस्यों की नियुक्ति जल्द करने की मांग की गई है। क्योंकि अगर व्यापार विवादों का निष्पक्ष समाधान ही नहीं होगा, तो बड़ी ताकतों के सामने छोटे और विकासशील देशों के अधिकार कमजोर पड़ सकते हैं।

BRICS की 2026 में भारत की अध्यक्षता की भी सदस्य देशों ने सराहना की। भारत में 30 शहरों में 400 से ज्यादा बैठकें आयोजित की गईं। इससे BRICS के एजेंडे को सिर्फ आर्थिक मुद्दों तक सीमित रखने के बजाय वैश्विक सुरक्षा, व्यापार, विकास और ग्लोबल साउथ की आवाज जैसे मुद्दों से जोड़ने की कोशिश दिखाई दी। 1955 के ऐतिहासिक बांडुंग सिद्धांतों—समानता, स्वतंत्रता और आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप—को भी याद किया गया। यानी भारत की अध्यक्षता में BRICS ने खुद को विकासशील देशों की सामूहिक आवाज के तौर पर और मजबूत करने का संदेश दिया है।

अब इस पूरे घोषणापत्र की बड़ी तस्वीर समझिए। एक तरफ आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश, दूसरी तरफ एकतरफा टैरिफ और आर्थिक प्रतिबंधों पर सवाल, तीसरी तरफ UN, IMF और World Bank में सुधार की मांग और चौथी तरफ विकासशील देशों को वैश्विक फैसलों में ज्यादा हिस्सेदारी देने की कोशिश। अब देखना यही होगा कि क्या BRICS का यह साझा घोषणापत्र वास्तव में वैश्विक व्यवस्था को बदलने की दिशा में पहला बड़ा कदम साबित होगा, या फिर ये बड़े-बड़े वादे सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएंगे। क्योंकि आने वाले समय में असली परीक्षा घोषणापत्र की नहीं, बल्कि इन फैसलों को जमीन पर लागू करने की होगी। और अगर BRICS अपने इन मुद्दों पर एकजुट रहता है, तो आने वाले वर्षों में ग्लोबल साउथ की आवाज पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर सुनाई दे सकती है।

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