असम में UCC लागू! अब दूसरी शादी पर 7 साल की जेल | Live-In पर भी सख्त नियम

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एक आदमी… एक शादी… वरना सीधा जेल! लिव-इन रिलेशनशिप भी अब सरकार को बताना पड़ेगा और शादी की उम्र अब धर्म नहीं बल्कि कानून तय करेगा। असम में पास हुआ UCC बिल सिर्फ एक कानून नहीं बल्कि ऐसा फैसला बन चुका है जिसने पूरे देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है।

नमस्कार, आज बात होगी उस कानून की जिसके बाद असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन गया है जहां Uniform Civil Code यानी UCC लागू करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम उठाया गया है। अब सवाल ये है कि आखिर इस कानून में ऐसा क्या है जिसकी वजह से कोई इसे महिलाओं के अधिकारों की जीत बता रहा है, तो कोई इसे धार्मिक आजादी पर हमला कह रहा है। तो चलिए आसान भाषा में समझते हैं असम UCC बिल के वो 10 बड़े नियम जो आने वाले समय में लोगों की जिंदगी बदल सकते हैं।

सबसे पहले बात उस नियम की जिसने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं। अब अगर कोई व्यक्ति एक शादी के बाद दूसरी शादी करता है तो उसे 7 साल तक की जेल हो सकती है। यानी बहुविवाह और द्विविवाह को लेकर कानून बेहद सख्त कर दिया गया है। सरकार साफ कह रही है — एक देश, एक कानून और एक पति या एक पत्नी। अब यहां बड़ा सवाल उठता है कि क्या ये फैसला महिलाओं की सुरक्षा के लिए है या फिर किसी खास समुदाय के निजी कानूनों में दखल? यही वजह है कि इस मुद्दे पर राजनीति भी तेज हो चुकी है।

अब दूसरा बड़ा बदलाव शादी की उम्र को लेकर किया गया है। धर्म चाहे कोई भी हो, अब लड़के की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़की की 18 साल तय कर दी गई है। सरकार का दावा है कि इससे बाल विवाह जैसी समस्याओं पर रोक लगेगी और लड़कियों को बेहतर शिक्षा और भविष्य मिलेगा।

अब तीसरा नियम जो हर शादीशुदा कपल के लिए बेहद जरूरी होने वाला है। अब सिर्फ शादी कर लेना काफी नहीं होगा बल्कि शादी के 60 दिनों के भीतर उसका सरकारी रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। अगर कोई जानबूझकर ऐसा नहीं करता तो 10 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यानी अब शादी सिर्फ समाज की नजरों में नहीं बल्कि सरकार के रिकॉर्ड में भी दर्ज होनी जरूरी होगी। और अगर किसी ने शादी या तलाक के रजिस्ट्रेशन में नकली दस्तावेज दिए तो सीधे 3 महीने तक की जेल या 25 हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।

अब बात उस नियम की जिसने सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा बहस छेड़ दी है — लिव-इन रिलेशनशिप। जी हां, अब असम में लिव-इन रिलेशनशिप का भी रजिस्ट्रेशन जरूरी होगा। अगर कोई कपल रजिस्ट्रेशन नहीं कराता तो 3 महीने तक की जेल या 10 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। और अगर किसी ने जानकारी छिपाई या झूठ बोला तो सजा और भी ज्यादा सख्त हो सकती है। यानी अब सिर्फ साथ रहना भी पूरी तरह निजी मामला नहीं रहने वाला।

अब बात तलाक के नियमों की। UCC के तहत अब अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग तलाक कानूनों की जगह समान आधार लागू किए जाएंगे जैसे क्रूरता, परित्याग या आपसी सहमति। साथ ही 5 साल से कम उम्र के बच्चों की कस्टडी मां को देने का प्रावधान भी रखा गया है। सरकार कह रही है कि इससे महिलाओं और बच्चों को ज्यादा सुरक्षा मिलेगी।

अब आते हैं संपत्ति और विरासत के नियमों पर। UCC के तहत पति-पत्नी, बच्चे और माता-पिता सभी को बराबरी का अधिकार देने की बात कही गई है। यानी अब महिलाओं को विरासत में बराबर हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा कोई भी मानसिक रूप से स्वस्थ बालिग व्यक्ति गवाहों के सामने लिखित वसीयत बना सकेगा। हालांकि सरकार ने साफ किया है कि धार्मिक परंपराएं खत्म नहीं होंगी। निकाह, वैदिक विवाह, आनंद कारज और अन्य पारंपरिक रस्में पहले की तरह जारी रहेंगी। यानी शादी की रस्में वही रहेंगी लेकिन कानून एक होगा। अब यहां सबसे जरूरी बात ये है कि अनुसूचित जनजातियों यानी ST समुदाय को इस कानून से बाहर रखा गया है। सरकार का कहना है कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं की रक्षा के लिए ऐसा किया गया है।

अब बात राजनीति की। Himanta Biswa Sarma का कहना है कि ये कानून महिलाओं को सुरक्षा और न्याय देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है, जबकि Asaduddin Owaisi समेत कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया है। ओवैसी का आरोप है कि ये मुसलमानों पर हिंदू कानून थोपने की कोशिश है। अब सच क्या है, ये आने वाला समय बताएगा, लेकिन इतना जरूर है कि असम में पास हुआ ये UCC बिल अब सिर्फ एक राज्य का मुद्दा नहीं रहा बल्कि पूरे देश की राजनीति और समाज में नई बहस की शुरुआत बन चुका है।

अब सवाल आपसे है — क्या पूरे देश में UCC लागू होना चाहिए? क्या एक देश में सभी के लिए एक जैसा कानून सही फैसला है या फिर इससे धार्मिक आजादी पर असर पड़ेगा?

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