क्या चुनावी तस्वीर उतनी ही साफ़ है, जितनी दिखाई जाती है, या उसके पीछे कोई ऐसा सवाल छिपा है, जिसका जवाब देश को जानना चाहिए? तेजस्वी यादव ने हाल ही में चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए, और उसी के बाद पूरा राजनीतिक माहौल जैसे एक पल के लिए रुक गया। सवाल यह था कि क्या वोटिंग के पीछे का गणित, सुरक्षा बलों की तैनाती और EVM की सुरक्षा, किसी छिपे खेल की ओर इशारा कर रहे हैं? और इसी बिंदु पर सामने आया चुनाव आयोग का चार-स्तरीय जवाब, जो न सिर्फ सीधा था, बल्कि एक तरह से चुनौती भरा भी।
चुनाव आयोग ने कहा कि पुरुष और महिला मतदाताओं के अनुपात का डेटा कोई अलग से छुपाया नहीं जाता, बल्कि अंतिम मतदान प्रतिशत के साथ पूरी पारदर्शिता से जारी किया जाता है। लेकिन यहाँ एक दिलचस्प बात थी: तेजस्वी का आरोप यह नहीं था कि डेटा जारी नहीं हुआ, बल्कि यह कि उसकी टाइमिंग और प्रस्तुति से कई बार धारणा बनती है कि कुछ तो पॉलिश किया गया है। इससे जिज्ञासा तो बढ़ती है, लेकिन आयोग ने यही बात सामने रखी कि नियम प्रक्रिया से ऊपर कोई नहीं, चाहे सवाल कितना भी बड़ा क्यों न हो।
सबसे अधिक चर्चा सुरक्षा बलों की तैनाती पर हुई। विपक्ष ने सवाल किया कि क्या राज्य पुलिस का चयन किसी राजनीतिक झुकाव से प्रभावित था? आयोग ने जवाब दिया कि तैनात बलों में 80 प्रतिशत CAPF के जवान हैं, और बाकी 20 प्रतिशत राज्य सशस्त्र पुलिस बल 24 अलग-अलग राज्यों से लिए गए हैं। इस सूची में उन राज्यों को भी शामिल किया गया, जहाँ बीजेपी की सरकार नहीं है। यह एक शक्तिशाली कॉन्ट्रास्ट था, मानो आयोग ने साफ कह दिया हो कि सुरक्षा राजनीति नहीं, ज़िम्मेदारी से तय होती है।
इसके बाद आया वह मुद्दा, जो हमेशा हर चुनाव में सबसे संवेदनशील रह चुका है: EVM और स्ट्रॉन्ग रूम की निगरानी। आयोग ने कहा कि हर स्ट्रॉन्ग रूम 24 घंटे CCTV की नज़र में है, और कैमरे में जरा सी खराबी भी तुरंत ठीक की जाती है। यह बात चुनाव आयोग के इरादों को मजबूत दिखाती है, लेकिन वहीँ लोगों के मन में सवाल अब भी तैरता है: “विश्वास क्या सिर्फ बयान से बन जाता है, या भरोसा देखने से आता है?”
यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र की असली परीक्षा होती है। सवाल और जवाब दोनों जनता के सामने हैं। अब फैसला सिर्फ EVM का नहीं, बल्कि विश्वास का है।



