Biscuits chips namkin par lagega Warning Label supreme court ne sarkar ko di aakhiri chetavani

बिस्किट-चिप्स-नमकीन पर लगेगा Warning Label? सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को दी आखिरी चेतावनी

बिस्किट-चिप्स-नमकीन के पैकेट पर वॉर्निंग लेबल लगाओ….. ज्यादा चीनी-नमक और फैट की जानकारी दो… नहीं तो फैक्ट्री को ताला लगाओ…. दोस्तों, आपने आज बिस्किट खाया? चिप्स खाए? नमकीन खाई? अब जरा सोचिए… जिस पैकेट को आप बड़े आराम से खोलकर खा रहे हैं, अगर उसी पैकेट के सामने बड़ा सा लिखा हो—“ज्यादा चीनी”, “ज्यादा नमक”, “ज्यादा फैट”… तो क्या आप फिर भी वही पैकेट खरीदेंगे? यही सवाल अब देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है—फैसला कीजिए, क्योंकि अगर सरकार फैसला नहीं करेगी, तो अदालत आदेश देगी। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है, क्योंकि अदालत ने एक और बेहद गंभीर सवाल पूछा है—क्या कॉरपोरेट कंपनियों का दबाव सरकार के फैसले पर असर डाल रहा है? आखिर मामला क्या है, सरकार की दलील क्या है, FSSAI क्या कह रहा है और सबसे बड़ा सवाल—क्या अब चिप्स, बिस्किट और नमकीन के पैकेट का पूरा चेहरा बदलने वाला है? चलिए पूरी कहानी समझते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में पैकेज्ड फूड पर Front-of-Pack Warning Label यानी FoPL को लेकर सुनवाई हुई। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच के सामने यह मामला आया। आसान भाषा में समझें तो पैकेट उठाते ही सामने आपको पता चल जाए कि उसमें चीनी ज्यादा है, नमक ज्यादा है या फैट ज्यादा है—बस यही इस वॉर्निंग लेबल का मकसद है। लेकिन इस मुद्दे पर लंबे समय से बहस चल रही है और अब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को साफ संदेश दे दिया है—बहुत हुआ विचार-विमर्श, अब फैसला कीजिए।

सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को लेकर इतना सख्त क्यों है? दरअसल मामला सिर्फ खाने का नहीं है, मामला है स्वास्थ्य का और खास तौर पर बच्चों के स्वास्थ्य का। कोर्ट ने कहा कि सरकार का फैसला कॉरपोरेट कंपनियों के दबाव में नहीं होना चाहिए। अदालत ने सरकार से सवाल किया कि क्या आप पर कॉरपोरेट घरानों का दबाव है? अब सोचिए, देश की सर्वोच्च अदालत खुद यह सवाल पूछ रही है, तो मामला कितना गंभीर है, आप समझ सकते हैं।

यह पूरा मामला एक जनहित याचिका यानी PIL के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ता का कहना था कि FSSAI की 7 मार्च की बैठक में जो फैसले लिए गए, वे सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों के अनुरूप नहीं थे। आरोप यह भी लगाया गया कि फूड इंडस्ट्री के विरोध को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है, जबकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सिविल सोसाइटी की चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। अब यहां सवाल बहुत सीधा है—अगर किसी खाने में चीनी, नमक या फैट ज्यादा है, तो क्या ग्राहक को यह बात सामने से नहीं पता चलनी चाहिए?

FSSAI की तरफ से अदालत में बताया गया कि फूड इंडस्ट्री पैकेट के सामने बड़े वॉर्निंग लेबल के पक्ष में नहीं है। इसके बजाय न्यूट्रिशन टेबल के जरिए जानकारी देने का सुझाव दिया गया है। यानी पैकेट पर बताया जाए कि उसमें कितनी एडेड शुगर है, कितना सैचुरेटेड फैट है और कितना सोडियम है। कंपनियों की चिंता है कि अगर पैकेट के सामने लाल चेतावनी दिखाई देगी, तो ग्राहक प्रोडक्ट खरीदने से बच सकते हैं। यानी कंपनियां कह रही हैं कि इससे बिजनेस पर असर पड़ेगा, लेकिन अदालत का सवाल है—पहले ग्राहक का स्वास्थ्य या कंपनियों का कारोबार? और यहीं से असली टकराव शुरू होता है।

अब सरकार की दलील भी समझिए। सरकार की तरफ से कहा गया कि भारत के पारंपरिक खाद्य पदार्थों में नमक और फैट की मात्रा ज्यादा हो सकती है। नमकीन, भुजिया और दूसरे स्नैक्स इसका उदाहरण हैं। सरकार का तर्क था कि अगर दूसरे देशों के मानक भारत में लागू कर दिए गए, तो संभव है कि कई पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थों पर भी रेड वॉर्निंग लग जाए। यानी सरकार की दलील यह थी कि भारत का खान-पान पश्चिमी देशों से अलग है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क पर भी सवाल खड़ा कर दिया।

अदालत ने सवाल किया—“क्या भारत को हमेशा एक अविकसित देश ही बने रहना चाहिए?” इस एक सवाल की गंभीरता समझिए। अदालत कह रही है कि अगर दुनिया के दूसरे देश अपने नागरिकों को यह जानकारी दे सकते हैं कि उनके खाने में क्या है, तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? कोर्ट ने एक और बात साफ कर दी—निर्माता को लेबल पसंद आए या नहीं, लेकिन ग्राहक को यह जानने का अधिकार है कि वह क्या खा रहा है। मतलब साफ है—कंपनी की पसंद बाद में, ग्राहक का अधिकार पहले।

अब सबसे बड़ा सवाल—क्या पैकेज्ड फूड के पैकेट पर अब रेड वॉर्निंग दिखाई देगी? इसका जवाब अभी पूरी तरह तय नहीं हुआ है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और FSSAI को दो सप्ताह का समय दिया है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर निर्धारित समय में कदम नहीं उठाए गए, तो अगली सुनवाई पर अदालत खुद आदेश जारी कर सकती है। यानी अब मामला सिर्फ सलाह या चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि अदालत के संभावित आदेश तक पहुंच चुका है।

दुनिया के कई देशों में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग के अलग-अलग मॉडल पहले से लागू हैं। चिली, मैक्सिको, ब्राजील, पेरू, उरुग्वे और इजरायल जैसे देशों में पैकेज्ड फूड के सामने स्पष्ट चेतावनी वाले लेबल लगाए जाते हैं। इसका मकसद एक ही है—ग्राहक को खरीदने से पहले जानकारी मिल जाए। अगर ग्राहक को सामने ही दिख जाए कि किसी प्रोडक्ट में चीनी या नमक की मात्रा ज्यादा है, तो वह खुद फैसला कर सकता है कि उसे खरीदना है या नहीं। यानी फैसला सरकार नहीं कर रही, फैसला कंपनी नहीं कर रही, फैसला ग्राहक कर रहा है।

और अब आपके लिए सबसे जरूरी बात। अगली बार जब आप बिस्किट, चिप्स, नमकीन या कोई पैकेज्ड स्नैक खरीदें, तो सिर्फ MRP और एक्सपायरी डेट मत देखिए। एक बार Nutrition Information भी जरूर देखिए। खासकर Added Sugar, Sodium और Saturated Fat की मात्रा पर ध्यान दीजिए। क्योंकि पैकेट जितना छोटा दिखाई देता है, उसके अंदर छिपी पोषण संबंधी जानकारी उतनी ही बड़ी हो सकती है।

तो पूरी कहानी का सार क्या है? सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ग्राहक को पता होना चाहिए कि वह क्या खा रहा है। सरकार और FSSAI के सामने अब दो हफ्ते की समय-सीमा है और अगर इस दौरान फैसला नहीं हुआ, तो अगली चाल अदालत चल सकती है। अब देखना यह होगा कि क्या भारत के चिप्स, बिस्किट और नमकीन के पैकेट पर आने वाले दिनों में बड़ी चेतावनी दिखाई देगी? क्या ग्राहक पैकेट उठाते ही देख पाएगा—चीनी कितनी, नमक कितना और फैट कितना? और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह सिर्फ एक लेबल होगा या फिर भारत में पैकेज्ड फूड खरीदने का पूरा तरीका बदल जाएगा? इसका जवाब अब आने वाले दिनों में मिलेगा।

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