Islamic nato ko Egypt ka jhatka pakistan ka nyota thukraya

इस्लामिक NATO को मिस्र का झटका! पाकिस्तान का न्योता ठुकराया, भारत-इजरायल क्यों जरूरी?

मिस्र ने ठुकराया पाकिस्तान का न्योता.. इस्लामिक NATO से बनाई दूरी… कहा भारत-इजरायल ज्यादा जरूरी, जी हाँ, एक तरफ पाकिस्तान है… साथ में सऊदी अरब है… तुर्की है… और दावा ये कि अगर एक पर हमला हुआ तो दूसरे पर हमला माना जाएगा। यानी एक ऐसा रक्षा समीकरण, जिसे दुनिया के कुछ हिस्सों में “इस्लामिक NATO” तक कहा जा रहा है। लेकिन इस पूरी कहानी में एक देश ऐसा है, जिसका नाम शुरुआत से इस खेल में था, बैठकों में था, बातचीत में था, लेकिन जब असली रक्षा समझौते की बारी आई… तो वही देश गायब था! नाम है—मिस्र। अब सवाल ये है… पाकिस्तान ने मिस्र को बुलाया था? मिस्र को इस नए रक्षा समीकरण में शामिल करने की कोशिश हुई? फिर मिस्र पीछे क्यों हट गया? और क्या इसकी वजह सिर्फ इजरायल है? या इसके पीछे भारत से लेकर अमेरिका तक एक बहुत बड़ा रणनीतिक गणित छिपा है? आइए समझते हैं पूरी कहानी।

देखिए… विदेश नीति भाषणों से नहीं चलती। विदेश नीति भावनाओं से नहीं चलती और विदेश नीति सिर्फ इस आधार पर भी नहीं चलती कि कौन किस धर्म का है। विदेश नीति चलती है राष्ट्रीय हित से। और मिस्र ने शायद इसी गणित को सबसे ऊपर रखा है। मिस्र जानता है कि पाकिस्तान और तुर्की के लिए इजरायल के खिलाफ सख्त रुख अपनाना एक बात है, लेकिन मिस्र के लिए मामला बिल्कुल अलग है। क्यों? क्योंकि मिस्र की सीमा सीधे उस इलाके से जुड़ी है, जहां इजरायल और फिलिस्तीन का संघर्ष चल रहा है। और गाजा से लगा हुआ है राफाह। यानी गाजा में कुछ भी बड़ा होता है, तो उसकी गूंज मिस्र तक पहुंचती है।

अब असली कहानी शुरू होती है—सिनाई की। मिस्र के लिए सिनाई सिर्फ जमीन नहीं है। सिनाई उसकी सुरक्षा है, उसका रणनीतिक कवच है। इतिहास गवाह है कि सिनाई को लेकर मिस्र कितना संवेदनशील रहा है। 1967 के युद्ध में इजरायल ने सिनाई पर कब्जा कर लिया था। मिस्र ने उसे वापस पाने के लिए वर्षों की कूटनीति की। फिर आया 1979… मिस्र और इजरायल के बीच शांति समझौता हुआ और इसके बाद दशकों तक दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने का सीधा युद्ध नहीं हुआ। अब जरा सोचिए… जिस देश ने इतनी मुश्किल से अपनी सीमा पर स्थिरता हासिल की हो, क्या वो किसी ऐसे सैन्य गठजोड़ में शामिल होगा, जो भविष्य में उसे इजरायल के साथ सीधे टकराव की स्थिति में ला सकता है? यहीं मिस्र की सबसे बड़ी मजबूरी सामने आती है।

लेकिन कहानी सिर्फ सिनाई तक नहीं है। सिनाई के ठीक पश्चिम में है स्वेज नहर। और स्वेज नहर का नाम आपने जरूर सुना होगा। भूमध्य सागर से लाल सागर और वहां से एशिया तक जाने वाला बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग। दुनिया का बड़ा समुद्री व्यापार इस रास्ते से जुड़ा है। अब अगर मिस्र किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध में फंसता है, तो नुकसान सिर्फ सीमा पर नहीं होगा। नुकसान होगा व्यापार को, पर्यटन को, निवेश को, विदेशी मुद्रा को और मिस्र की पूरी अर्थव्यवस्था को। यानी काहिरा के लिए सवाल ये नहीं है कि “इजरायल के खिलाफ कौन खड़ा है?” सवाल ये है कि “अगर हम इस लड़ाई में उतरे, तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा?” और जवाब है—मिस्र खुद।

अब गाजा के संकट को समझिए। अगर गाजा में युद्ध लंबा चलता है, अगर बड़ी संख्या में लोग विस्थापित होते हैं, अगर हथियारबंद गतिविधियां सीमा के आसपास बढ़ती हैं, तो मिस्र को सबसे बड़ा डर किस बात का है? कि गाजा का संकट सिनाई में न फैल जाए। यही वजह है कि मिस्र एक तरफ गाजा में मध्यस्थ की भूमिका निभाता है, युद्धविराम की कोशिश करता है और फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपनी आवाज उठाता है, लेकिन दूसरी तरफ अपनी सीमा की सुरक्षा को लेकर बेहद सावधान रहता है। यानी मिस्र की नीति को समझने के लिए एक लाइन याद रखिए—फिलिस्तीन के साथ राजनीतिक समर्थन, लेकिन सिनाई के लिए रणनीतिक सावधानी।

अब यहां कहानी में भारत आता है। भारत और मिस्र की दोस्ती नई नहीं है। नेहरू के दौर से दोनों देशों के रिश्ते मजबूत रहे हैं। दोनों देश गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख देशों में रहे हैं। यानी एक सोच दोनों के बीच पहले से रही है—अपना फैसला खुद लेना। आज भारत मिस्र के लिए सिर्फ एक बड़ा बाजार नहीं है। भारत के साथ व्यापार है, निवेश है, तकनीकी सहयोग है, रक्षा सहयोग है और सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रणनीतिक हित हैं। भारत का हिंद महासागर, लाल सागर और स्वेज नहर—इन सबके बीच एक रणनीतिक कनेक्शन बनता है। इसलिए मिस्र के लिए भारत के साथ संबंध सिर्फ दोस्ती की तस्वीर नहीं, बल्कि व्यावहारिक राष्ट्रीय हित का मामला है।

तो क्या मिस्र ने पाकिस्तान को छोड़कर भारत को चुन लिया? अब यहां रुकिए! क्योंकि ये कहना कि “मिस्र ने पाकिस्तान को छोड़ दिया और भारत को चुन लिया”, शायद पूरी तस्वीर नहीं है। मिस्र की विदेश नीति इससे कहीं ज्यादा जटिल है। मिस्र पाकिस्तान से भी संबंध रखेगा, तुर्की से भी बातचीत करेगा, सऊदी अरब के साथ भी सहयोग करेगा और फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी अपनी भूमिका निभाएगा। लेकिन वह किसी ऐसे सैन्य गठजोड़ में जाने से बचेगा, जो उसके अपने राष्ट्रीय हित को खतरे में डाल दे। यानी मिस्र किसी एक खेमे में पूरी तरह खड़ा होने के बजाय कई खेमों के बीच अपना रास्ता बनाए रखना चाहता है।

और अमेरिका का कनेक्शन भी समझिए। मिस्र के लिए अमेरिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। मिस्र को अमेरिकी सैन्य और आर्थिक सहयोग मिलता है। दूसरी तरफ अमेरिका के लिए मिस्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गाजा, स्वेज, लाल सागर और पूरा अरब क्षेत्र मिस्र की रणनीतिक स्थिति से जुड़े हैं। ऐसे में अगर मिस्र इजरायल के खिलाफ किसी कठोर सैन्य गठजोड़ का हिस्सा बनता है, तो मामला सिर्फ मिस्र और इजरायल तक सीमित नहीं रह सकता। इसका असर अमेरिका के साथ उसके संबंधों पर भी पड़ सकता है। और काहिरा शायद इस कीमत को चुकाने के लिए तैयार नहीं है।

अब सबसे बड़ा सवाल—क्या पाकिस्तान का रक्षा समझौता कमजोर है? नहीं। क्या तुर्की और सऊदी अरब का सहयोग महत्वपूर्ण नहीं है? बिल्कुल है। लेकिन क्या हर मुस्लिम देश एक ही रणनीतिक रास्ते पर चलेगा? जरूरी नहीं। क्योंकि धर्म एक साझा पहचान दे सकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का फैसला अक्सर भूगोल करता है। और मिस्र का भूगोल उसे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। एक तरफ गाजा, दूसरी तरफ सिनाई, सामने इजरायल, पीछे स्वेज नहर और ऊपर से अमेरिका और वैश्विक अर्थव्यवस्था का दबाव। तो मिस्र कैसे ऐसा फैसला ले, जो इन सबको नजरअंदाज कर दे?

अगर मिस्र आज इस रक्षा समझौते से बाहर है, तो क्या वो हमेशा बाहर रहेगा? तुर्की की तरफ से उम्मीद जताई गई है कि मिस्र भविष्य में इस व्यवस्था में शामिल हो सकता है। तो क्या आने वाले दिनों में काहिरा अपना फैसला बदल सकता है? या फिर मिस्र अपनी वही नीति जारी रखेगा, जहां पाकिस्तान से दोस्ती भी रहेगी, तुर्की से बातचीत भी, सऊदी अरब से संबंध भी, फिलिस्तीन के लिए आवाज भी और भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी भी? यही आने वाले समय का सबसे बड़ा सवाल है।

क्योंकि पश्चिम एशिया में दोस्ती के नारे बहुत हैं, गठबंधन बहुत हैं और धार्मिक समानताएं भी बहुत हैं। लेकिन जब राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल आता है, तो आखिरी फैसला अक्सर एक ही चीज करती है—राष्ट्रीय हित। और शायद मिस्र का संदेश भी यही है—दोस्त कई हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित से बड़ा कोई गठबंधन नहीं होता।

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