bete bahu ko property se bedakhal kar sakte hain mata pita supreme court ne saaf kiya niyam

बेटे-बहू को प्रॉपर्टी से बेदखल कर सकते हैं माता-पिता? सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया नियम

बच्चों को प्रॉपर्टी से बेदखल कर सकते हैं माता-पिता… जी हाँ, बुजुर्ग माता-पिता को सताया तो घर से निकलना होगा… चाहे वो बेटा हो, बेटी हो या बहु हो… किसी की कोई भी मनमानी नहीं चलेगी…. दोस्तों, जरा सोचिए जिस घर को बनाने में माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी… क्या उसी घर में उनके बेटे या बहू को रहने का अधिकार उनसे भी बड़ा हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े फैसले ने इस सवाल का जवाब दे दिया है—और फैसला ऐसा है, जिसे हर माता-पिता और हर संतान को जरूर जानना चाहिए! क्योंकि अब मामला सिर्फ मकान का नहीं… माता-पिता के सम्मान, सुरक्षा और अधिकार का है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि बढ़ती उम्र का मतलब अपमान और असुरक्षा के साथ जिंदगी गुजारना नहीं है। अगर बेटे या बहू का घर में रहना बुजुर्ग माता-पिता के भरण-पोषण, सुरक्षा या सम्मान में बाधा बन रहा है, तो परिस्थितियों के अनुसार उन्हें घर से बेदखल करने का आदेश दिया जा सकता है। लेकिन सवाल ये है कि क्या माता-पिता जब चाहें, अपने बच्चों को प्रॉपर्टी से निकाल सकते हैं? क्या इसके लिए कोई कानूनी प्रक्रिया है? और आखिर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलट दिया? इन सवालों का जवाब इस खबर में आपको पूरी तरह समझ आएगा।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस मामले में बेहद अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कितना सम्मान और कितनी सुरक्षा का व्यवहार करता है। यानी उम्र बढ़ना किसी व्यक्ति को कमजोर और अधिकारहीन नहीं बना देता। अगर कोई बुजुर्ग अपने ही घर में डर, अपमान, असुरक्षा या उपेक्षा के माहौल में रहने को मजबूर है, तो कानून उसके संरक्षण के लिए रास्ता देता है। और यहीं से इस पूरे मामले की कहानी शुरू होती है।

यह मामला लखनऊ के विकास नगर के एक मकान से जुड़ा है। मामले में 81 साल की एक बुजुर्ग महिला को कथित तौर पर घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा। आरोप था कि उनके पोते के व्यवहार के कारण उनके लिए घर में रहना मुश्किल हो गया था। सोचिए… जिस उम्र में एक बुजुर्ग को परिवार का सहारा चाहिए, उसी उम्र में अगर उसे अपना घर छोड़कर वृद्धाश्रम जाना पड़े, तो इससे बड़ा सवाल परिवार और समाज के सामने क्या हो सकता है? इसी विवाद के बाद प्रशासन के सामने मामला पहुंचा। 15 नवंबर 2022 को SDM ने बेटे को मकान से निकालने का आदेश दिया। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने भी 9 अगस्त 2023 को इस आदेश को बरकरार रखा और बेटे-बहू को मकान खाली करने का आदेश दिया। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई। असल कानूनी लड़ाई तो इसके बाद शुरू हुई।

बेटे और बहू ने SDM और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत ट्रिब्यूनल को वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से उसके बच्चों को बेदखल करने की शक्ति नहीं है। नतीजा यह हुआ कि SDM और जिला मजिस्ट्रेट के दोनों आदेश रद्द कर दिए गए। अब मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट। और यहीं पर आया सबसे बड़ा कानूनी ट्विस्ट।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने माना कि अगर किसी वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हो, तो मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल परिस्थितियों के अनुसार बेदखली का आदेश दे सकता है। यानी यह फैसला सिर्फ इतना नहीं कहता कि “माता-पिता बच्चों को घर से निकाल सकते हैं।” असल बात इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। कानून का मकसद है कि बुजुर्ग माता-पिता को अपने ही घर में असुरक्षित, अपमानित या उपेक्षित होकर न रहना पड़े।

लेकिन यहां एक बात बेहद जरूरी है। इस फैसले को यह समझना गलत होगा कि हर माता-पिता बिना किसी कारण के अपने बेटे या बहू को कभी भी घर से निकाल सकते हैं और हर मामले में ट्रिब्यूनल तुरंत बेदखली कर देगा। मामला परिस्थितियों, वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा और भरण-पोषण से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के कानून के प्रावधानों को इसी उद्देश्य से पढ़ा है कि वरिष्ठ नागरिकों को वास्तविक सुरक्षा मिल सके। धारा 7 के तहत मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जबकि धारा 8 उन्हें कुछ मामलों में सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां देती है। वहीं धारा 27 सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को सीमित करती है। कोर्ट ने माना कि कानून के उद्देश्य को प्रभावी बनाने के लिए ट्रिब्यूनल जरूरी और सहायक आदेश जारी कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 2021 के एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर मामले का भी हवाला दिया। इसमें भी कोर्ट ने माना था कि अगर वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए जरूरी हो, तो ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। इसके बाद समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार और कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर जैसे मामलों में भी यही कानूनी स्थिति दोहराई गई। यानी यह कोई अचानक लिया गया रुख नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पुराने न्यायिक फैसलों की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए बुजुर्गों की सुरक्षा को केंद्र में रखा है।

अब समझिए 2007 का कानून आखिर कहता क्या है। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र का व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक माना जाता है। अगर बच्चे या जिम्मेदार रिश्तेदार उनका भरण-पोषण नहीं करते, तो वरिष्ठ नागरिक मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में आवेदन कर सकते हैं। कानून में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की खाने, कपड़े, रहने और इलाज जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी का प्रावधान है। जानबूझकर किसी वरिष्ठ नागरिक को छोड़ देने पर कानून में 3 महीने तक की जेल या 5 हजार रुपये तक जुर्माने या दोनों का प्रावधान भी है। इतना ही नहीं, अगर किसी बुजुर्ग ने इस शर्त पर अपनी संपत्ति ट्रांसफर की है कि सामने वाला उसकी देखभाल करेगा, लेकिन बाद में देखभाल नहीं की जाती, तो कुछ परिस्थितियों में मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल उस ट्रांसफर को रद्द करने का रास्ता भी दे सकता है। यानी यह कानून सिर्फ पेंशन या खर्चे की बात नहीं करता। यह बुजुर्गों के सम्मान, सुरक्षा, भरण-पोषण, इलाज और संपत्ति से जुड़े अधिकारों को भी संरक्षण देता है।

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा संदेश यही है—माता-पिता ने जिंदगीभर बच्चों को सहारा दिया है, तो बुढ़ापे में उनका सहारा छीनना कानून और समाज—दोनों के लिए गंभीर सवाल है। सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—“बढ़ती उम्र, अपमान सहने की मजबूरी नहीं है।” और अगर किसी बुजुर्ग की सुरक्षा और सम्मान खतरे में पड़ता है, तो कानून उसके संरक्षण के लिए हस्तक्षेप कर सकता है। इसलिए इस फैसले को सिर्फ “माता-पिता बच्चों को घर से निकाल सकते हैं” वाली खबर के रूप में मत देखिए। यह असल में बुजुर्गों के सम्मान और सुरक्षित जीवन के अधिकार से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला है। क्योंकि घर सिर्फ चार दीवारों का नाम नहीं होता… लेकिन अगर उन्हीं चार दीवारों के अंदर माता-पिता सुरक्षित नहीं हैं, तो कानून उन दीवारों से ज्यादा उनके सम्मान और सुरक्षा को महत्व देता है। और यही इस सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे बड़ा संदेश है। अगर आपको लगता है कि हर बेटे-बेटी को अपने माता-पिता के अधिकारों से जुड़ी यह जानकारी पता होनी चाहिए, तो इस खबर को आगे जरूर शेयर कीजिए।

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