क्या शादी से पहले बने रिश्ते किसी के चरित्र पर दाग हैं? क्या सिर्फ एक पुराने प्रेम संबंध की वजह से किसी का करियर बर्बाद किया जा सकता है? और आखिर ऐसा क्या हुआ कि सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा — ‘शादी से पहले शारीरिक संबंध चरित्र पर दाग नहीं हैं!’… इस फैसले ने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी है। आखिर कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? और इसका असर लाखों युवाओं पर कैसे पड़ेगा?
दोस्तों, देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी इस समय देशभर में चर्चा का विषय बन गई है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि दो बालिग और अविवाहित लोगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी व्यक्ति के चरित्र पर दाग नहीं माने जा सकते। लेकिन सवाल ये है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को ऐसी टिप्पणी करने की जरूरत क्यों पड़ी?
दरअसल, मामला तेलंगाना का है, जहां एक युवक का चयन पुलिस कॉन्स्टेबल के पद के लिए हुआ था। लेकिन उसका चयन अचानक रद्द कर दिया गया। और रद्द करने का कारण था उसके खिलाफ साल 2014 में एक महिला द्वारा मामला दर्ज कराया गया था। आरोप था कि युवक ने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
हालांकि बाद में यह मामला लोक अदालत में समझौते के जरिए खत्म हो गया और शिकायतकर्ता ने भी मामले को आगे नहीं बढ़ाया। लेकिन इसके बावजूद पुलिस भर्ती बोर्ड ने युवक को नौकरी देने से इनकार कर दिया। बोर्ड का कहना था कि यह मामला “मोरल टरपिट्यूड” यानी नैतिक अधमता से जुड़ा है और ऐसा व्यक्ति पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता।
अब यहीं से शुरू हुई कानूनी लड़ाई… मामला पहले हाईकोर्ट पहुंचा, फिर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक जा पहुंचा। और सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा, उसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा… हर रिश्ता शादी में नहीं बदलता। सिर्फ इसलिए कि कोई प्रेम संबंध शादी तक नहीं पहुंचा, इसका मतलब यह नहीं कि किसी ने दूसरे व्यक्ति को धोखा दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आज के बदलते सामाजिक माहौल में अधिकारियों को पुरानी सोच छोड़कर वास्तविकता को समझना होगा। कोर्ट ने साफ किया कि यदि दो बालिग लोग अपनी मर्जी से किसी रिश्ते में रहते हैं, तो उसे चरित्रहीनता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यानी कोर्ट का मानना है कि व्यक्तिगत रिश्तों और सरकारी नौकरी की योग्यता को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती… सुप्रीम कोर्ट ने एक और बड़ी बात कही। अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि कोई आपराधिक मामला समझौते के साथ खत्म हो गया, इसका मतलब यह नहीं कि आरोपी ने अपराध स्वीकार कर लिया। कोर्ट के अनुसार जब तक ठोस सबूत मौजूद न हों, तब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ नकारात्मक धारणा बनाना गलत है।
बेंच ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि महिला पर समझौते के लिए दबाव बनाया गया था या फिर युवक ने वास्तव में धोखाधड़ी की थी। यही नहीं, अदालत ने यह भी कहा कि धोखाधड़ी हुई थी या नहीं, यह केवल शिकायतकर्ता ही बता सकती थी। आम लोगों की राय या अनुमान के आधार पर किसी के चरित्र का फैसला नहीं किया जा सकता। और इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस भर्ती बोर्ड का फैसला पलट दिया और उम्मीदवार को राहत दे दी।
अब इस फैसले की चर्चा सिर्फ कोर्टरूम तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर लोग दो हिस्सों में बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कुछ लोग इसे युवाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आधुनिक सोच की जीत बता रहे हैं। तो वहीं कुछ लोग मानते हैं कि इससे समाज में गलत संदेश जा सकता है।
लेकिन एक बात साफ है… सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश जरूर दिया है कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके पूरे जीवन और उसके वास्तविक आचरण के आधार पर होना चाहिए, न कि सिर्फ उसके निजी रिश्तों के आधार पर।
अब सबसे बड़ा सवाल ये है की क्या आप सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सहमत हैं? क्या शादी से पहले आपसी सहमति से बने रिश्तों को किसी के चरित्र का पैमाना नहीं माना जाना चाहिए? या फिर आपको लगता है कि ऐसे मामलों में और सख्त सोच की जरूरत है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए।



