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UP पंचायत चुनाव क्यों टले? OP Rajbhar ने बताया पूरा सच, अब अदालत करेगी फैसला

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव आखिर टल क्यों गए? क्या इसके पीछे सिर्फ कानूनी अड़चन है या फिर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कोई बड़ा राजनीतिक खेल खेला जा रहा है? योगी सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने अब इस पूरे मामले पर ऐसा बयान दिया है जिसने यूपी की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। दरअसल, उत्तर प्रदेश के ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो चुका है और कार्यकाल खत्म होने के बाद सभी प्रधानों को प्रशासक के रूप में नियुक्त कर दिया गया है। हालांकि अब वे कोई बड़ा नीतिगत फैसला नहीं ले सकते और ऐसे फैसलों के लिए उन्हें जिलाधिकारी या कलेक्टर की मंजूरी लेनी होगी। माना जा रहा था कि पंचायत चुनाव फरवरी से अप्रैल के बीच हो जाएंगे, लेकिन आरक्षण प्रक्रिया और पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन में हुई देरी के कारण चुनावी प्रक्रिया लगातार धीमी पड़ती चली गई।

इसी बीच योगी सरकार के मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने पंचायत चुनावों में देरी के लिए समाजवादी पार्टी को जिम्मेदार ठहराया है। राजभर का कहना है कि समाजवादी पार्टी के सलाहकारों और वकीलों ने अदालत में याचिकाएं दाखिल कीं, जिसके बाद मामला न्यायपालिका के पास पहुंच गया। उनके अनुसार अब पंचायत चुनावों को लेकर जो भी फैसला होगा, वह अदालत के निर्देशों के अनुसार ही होगा। राजभर ने यह भी कहा कि अदालत ने पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का आदेश दिया था, जिसके बाद सरकार ने आयोग का गठन किया और एक समिति भी बनाई गई जो अपना काम कर रही है। अदालत जो भी आदेश देगी, सरकार उसे लागू करेगी।

दरअसल पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। योगी सरकार ने मई के दूसरे सप्ताह में कैबिनेट से आयोग के गठन को मंजूरी दी और तीसरे सप्ताह में आयोग के सदस्यों की घोषणा की गई। अब यह आयोग अगले छह महीनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा। इसके बाद रिपोर्ट पर आपत्तियां मांगी जाएंगी, उनकी सुनवाई होगी और फिर अंतिम आरक्षण सूची तैयार की जाएगी। जानकारों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में कम से कम छह से आठ महीने का समय लग सकता है।

यही वजह है कि अब यह संभावना काफी मजबूत हो गई है कि उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव 2027 के विधानसभा चुनावों के बाद ही कराए जाएं। यानी गांव की राजनीति से लेकर प्रदेश की राजनीति तक, सबकी नजर अब अदालत के अगले फैसले और पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट पर टिकी हुई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पंचायत चुनावों में हुई यह देरी सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है या फिर इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति भी काम कर रही है? अपनी राय हमें कमेंट करके जरूर बताइए।

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