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UP चुनाव से पहले बड़ा सियासी खेल! AIMIM नेता ने बदला पाला, सपा की रणनीति से BJP तक हलचल

उत्तर प्रदेश में चुनाव अभी दूर है, लेकिन सियासी खेल शुरू हो चुका है। नेता पाला बदल रहे हैं, पार्टियां अपने कुनबे को मजबूत करने में जुटी हैं और पर्दे के पीछे चल रही है वोटों की बड़ी गणित। बुधवार को AIMIM के वरिष्ठ नेता और मुख्य प्रवक्ता सैयद असीम वकार कांग्रेस में शामिल हो गए। अब सवाल ये है कि वकार का कांग्रेस में जाना सिर्फ एक नेता का दल-बदल है या फिर यूपी चुनाव से पहले किसी बड़े सियासी प्लान का ट्रेलर? क्योंकि एक तरफ कांग्रेस अपने कुनबे को मजबूत करने में जुटी है, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी भी गठबंधन में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने की तैयारी कर रही है और तीसरी तरफ सवाल ये है कि भाजपा इस पूरे सियासी खेल को किस नजर से देख रही है।

बुधवार को AIMIM के वरिष्ठ नेता और मुख्य प्रवक्ता सैयद असीम वकार ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। कांग्रेस मुख्यालय में उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के प्रमुख इमरान प्रतापगढ़ी की मौजूदगी में वकार कांग्रेस में शामिल हुए। कांग्रेस में शामिल होने के बाद वकार ने कहा कि राहुल गांधी ही निडर होकर देशभर में भाजपा से लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने शिक्षा, रोजगार, छात्रों, महिलाओं और समाज के वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों को लेकर राहुल गांधी के आंदोलनों से प्रेरित होकर कांग्रेस में शामिल होने की बात कही। लेकिन असली राजनीतिक बयान इसके बाद आया, क्योंकि कांग्रेस में शामिल होते ही सैयद असीम वकार ने AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी पर निशाना साध दिया।

वकार ने आरोप लगाया कि ओवैसी भाजपा को हटाने की बात तो करते हैं, लेकिन जमीन पर भाजपा का विरोध करने वाली पार्टियों के खिलाफ लड़ाई लड़ते हैं। अब आप समझिए, ये सिर्फ पार्टी बदलने वाला बयान नहीं है, बल्कि सीधे-सीधे राजनीतिक रणनीति पर सवाल है। यही वजह है कि वकार का कांग्रेस में जाना यूपी की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। सवाल ये भी है कि कांग्रेस के लिए इस राजनीतिक बदलाव का कितना फायदा हो सकता है और क्या इससे पार्टी अपने संगठन और सामाजिक समीकरण को और मजबूत कर पाएगी?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नेता की ताकत सिर्फ उसकी अपनी सीट तक सीमित नहीं होती। कई बार एक नेता का क्षेत्रीय प्रभाव, संगठन में पकड़ और किसी खास वर्ग के बीच राजनीतिक असर पूरे चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस भी शायद इसी वजह से अपने संगठन को मजबूत करने में जुटी है। उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने वकार के कांग्रेस में शामिल होने को पार्टी के लिए सकारात्मक बताया और उन्हें एक बेहतरीन वक्ता बताया। वहीं अजय राय और इमरान प्रतापगढ़ी ने राहुल गांधी की ‘मोहब्बत की दुकान’ मुहिम का जिक्र करते हुए कहा कि नए सदस्यों के जुड़ने से कांग्रेस प्रदेश में मजबूत हो रही है और आने वाले दिनों में कई और जाने-माने चेहरे कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। यानी कांग्रेस की तैयारी सिर्फ आज के एक चेहरे तक सीमित दिखाई नहीं दे रही है।

अब कहानी का दूसरा और बेहद अहम हिस्सा समाजवादी पार्टी से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी भी चुनावी तैयारी तेज कर रही है और पार्टी का फोकस गठबंधन को मजबूत करने, संगठन को मजबूत करने और सीटों के बंटवारे में अपनी दावेदारी को मजबूत करने पर है। इसके लिए दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश भी की जा रही है। अब सवाल उठता है कि आखिर सीटों के बंटवारे से पहले नेताओं को अपने साथ जोड़ने की इतनी कोशिश क्यों की जा रही है? इसका जवाब राजनीति की उसी पुरानी गणित में छिपा है, जहां संख्या सिर्फ संख्या नहीं होती, बल्कि संख्या ही ताकत होती है। जितने ज्यादा मजबूत चेहरे, जितना मजबूत संगठन और जितना बड़ा राजनीतिक प्रभाव, गठबंधन की बातचीत में उतनी ही मजबूत दावेदारी।

यानी पाला बदलने का खेल सिर्फ पार्टी बदलने का खेल नहीं है। ये आने वाले चुनाव में अपनी बर्गेनिंग पावर बढ़ाने का खेल भी हो सकता है। एक तरफ कांग्रेस अपने कुनबे को बढ़ाने में जुटी है, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी अपने गठबंधन और संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में अगर कुछ और राजनीतिक चेहरे अपना पाला बदलते हैं, तो उत्तर प्रदेश का चुनावी गणित और ज्यादा दिलचस्प हो सकता है।

अब सवाल आता है भाजपा का। उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा को नजरअंदाज करके कोई भी चुनावी तस्वीर पूरी नहीं हो सकती। विपक्षी दल अगर अपने समीकरण मजबूत करेंगे तो भाजपा भी अपने संगठन और चुनावी रणनीति को उसी हिसाब से धार देने की कोशिश करेगी। मतलब एक तरफ सपा और कांग्रेस अपने-अपने तरीके से राजनीतिक ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा के सामने विपक्षी समीकरणों का मुकाबला करने की चुनौती होगी। और यही वो जगह है जहां यूपी का चुनाव सिर्फ चुनाव नहीं रह जाता, बल्कि सियासी शतरंज बन जाता है। हर पार्टी अपने मोहरे मजबूत करने में जुटती है और हर कदम के पीछे अगले कदम की तैयारी छिपी होती है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है। असीम वकार कांग्रेस में आ गए, कांग्रेस कह रही है कि आने वाले दिनों में और चेहरे पार्टी में शामिल हो सकते हैं और समाजवादी पार्टी भी दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। तो फिर सवाल ये है कि अगला चेहरा कौन होगा? कौन सा नेता किस पाले में जाएगा? कौन सा दल किसके साथ गठबंधन करेगा? और सबसे बड़ा सवाल, क्या चुनाव से पहले होने वाली ये सियासी आवाजाही यूपी के वोटिंग पैटर्न पर भी असर डालेगी? अभी इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है, लेकिन एक बात साफ है कि उत्तर प्रदेश की सियासी बिसात बिछ चुकी है और मोहरों की चाल शुरू हो चुकी है।

कांग्रेस अपना कुनबा बढ़ाने की कोशिश कर रही है, समाजवादी पार्टी गठबंधन में अपनी ताकत और दावेदारी बढ़ाने की तैयारी कर रही है और भाजपा के सामने इन संभावित विपक्षी समीकरणों का मुकाबला करने की चुनौती होगी। यानी यूपी चुनाव से पहले ही पाला बदलने का खेल शुरू हो चुका है। अब देखना ये है कि अगली चाल कौन चलता है, अगला बड़ा चेहरा कौन पाला बदलता है और जब चुनावी रण पूरी तरह सजेगा तो इस सियासी शतरंज में किसका पलड़ा भारी पड़ेगा। क्योंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव सिर्फ मतदान वाले दिन नहीं शुरू होता, बल्कि चुनावी तैयारी उस दिन से शुरू हो जाती है, जब पहला बड़ा नेता अपना पाला बदलता है। और फिलहाल यूपी की सियासत में पहली बड़ी चाल चल चुकी है।

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