rss ko registration ki jarurat nahi santosh ka kharge ko karara jwab

RSS को रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं! संतोष का खरगे को करारा जवाब, ‘अखंड भारत’ पर बड़ा ऐलान

RSS के पंजीकरण से शुरू हुआ विवाद अब ‘अखंड भारत’ और 1948 के इतिहास तक पहुंच गया है—आखिर बीएल संतोष और प्रियांक खरगे के बीच छिड़ी इस जंग के पीछे पूरा मामला क्या है?….

दोस्तों, एक सवाल से शुरू हुई कहानी अब इतिहास, RSS और ‘अखंड भारत’ तक पहुंच गई है। भारत की सियासत में इस वक्त सिर्फ बयान नहीं चल रहे, बल्कि इन बयानों के पीछे इतिहास की एक बड़ी बहस खड़ी हो गई है। एक तरफ कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे RSS के पंजीकरण की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव संगठन बीएल संतोष कह रहे हैं कि RSS को अपने अस्तित्व के लिए किसी कागज की जरूरत नहीं है। अब सवाल ये है कि आखिर इस विवाद की असली वजह क्या है? क्या बात सिर्फ RSS के रजिस्ट्रेशन की है, या इसके पीछे आजादी, विभाजन और भारत की पहचान को लेकर एक बहुत बड़ी राजनीतिक बहस छिपी हुई है? क्योंकि बीएल संतोष ने सिर्फ RSS के पंजीकरण पर जवाब नहीं दिया, बल्कि आजादी के इतिहास, हिंदू आबादी और ‘अखंड भारत’ को लेकर भी कई बड़े दावे और बातें कहीं। इसके बाद प्रियांक खरगे ने भी पलटवार किया और संतोष के हैदराबाद तथा खरगे परिवार से जुड़े दावे को सीधे खारिज कर दिया। तो आखिर दोनों तरफ से कहा क्या गया? आइए पूरी कहानी समझते हैं।

कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने RSS के पंजीकरण की मांग उठाई थी। अब इस पर बीएल संतोष का जवाब सामने आया। संतोष ने कहा कि किसी संगठन का अस्तित्व सिर्फ पंजीकरण से तय नहीं होता। उनका कहना था कि RSS लाखों लोगों के भरोसे से चलता है। उन्होंने कहा कि विभाजन के समय भी RSS पंजीकृत नहीं था और आज भी उसका औपचारिक पंजीकरण नहीं है। यानी संतोष का तर्क साफ है कि संगठन की ताकत किसी कागज में नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास में होती है। लेकिन यहां कहानी खत्म नहीं होती, क्योंकि इसके बाद बीएल संतोष ने इस मुद्दे को सीधे आजादी और विभाजन के इतिहास से जोड़ दिया।

बीएल संतोष ने कहा कि भारत को आजादी सिर्फ नमक सत्याग्रह या चरखा चलाने से नहीं मिली। उन्होंने मदन लाल ढींगरा, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों को याद करते हुए कहा कि देश की आजादी के पीछे हजारों क्रांतिकारियों और लाखों देशभक्त युवाओं तथा सैनिकों का बलिदान था। संतोष ने कहा कि आजादी किसी ने भारत को तोहफे में नहीं दी थी और अंग्रेजों ने यूं ही भारत को आजाद नहीं किया। उनके बयान का संदेश यही था कि देश की स्वतंत्रता की कहानी में उन क्रांतिकारियों और बलिदानियों के योगदान को भी याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने अपने प्राण न्योछावर किए।

इसके बाद बीएल संतोष ने हिंदू आबादी को लेकर भी बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि किसी इलाके में हिंदू आबादी कम होने से भारत से जुड़ाव की भावना कमजोर होती है। उन्होंने दावा किया कि जहां हिंदू आबादी घटती है, वहां ‘राष्ट्रविरोधी भावना’ पैदा होने लगती है। बंगलूरू की शिवाजीनगर और चामराजपेट विधानसभा सीटों का जिक्र करते हुए संतोष ने कहा कि करीब दो दशक से वहां किसी राजनीतिक दल का हिंदू उम्मीदवार नहीं जीता है। इसके बाद उन्होंने कहा कि हिंदुओं को बहुमत में इसलिए रहना चाहिए क्योंकि भारत को भारत ही रहना है। संतोष ने पाकिस्तान की मांग और देश के विभाजन की चर्चा करते हुए मुस्लिम लीग की राजनीतिक लामबंदी को भी विभाजन से जोड़ा। जाहिर है, इस बयान के बाद बहस सिर्फ चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारत की पहचान और जनसंख्या को लेकर भी सवाल उठने लगे।

लेकिन बीएल संतोष के बयान का सबसे बड़ा हिस्सा ‘अखंड भारत’ को लेकर सामने आया। ‘अखंड भारत संकल्प दिवस’ कार्यक्रम में संतोष ने कहा कि अविभाजित भारत का विचार सिर्फ कोई प्रशासनिक सपना नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी सपना है। उन्होंने लोगों से संकल्प लेने की अपील की कि हमारे बीच जो सबसे बुजुर्ग लोग हैं, वे अपने जीवनकाल में अखंड भारत को अपनी आंखों से देखने का लक्ष्य रखें। संतोष ने इस विचार को असंभव मानने से भी इनकार किया। उन्होंने पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण तथा वियतनाम के एक होने का उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास में ऐसे बदलाव पहले भी हुए हैं। यानी संतोष ने ‘अखंड भारत’ को सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि लंबे समय के सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी लक्ष्य के रूप में पेश किया।

अब इस पूरे मामले में सबसे बड़ा पलटवार प्रियांक खरगे की तरफ से आया। बीएल संतोष ने दावा किया था कि हैदराबाद रियासत के भारत में विलय के दौरान रजाकारों की हिंसा के समय RSS कार्यकर्ताओं ने खरगे परिवार और वहां के लोगों की रक्षा की थी। प्रियांक खरगे ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि उनके परिवार और उस क्षेत्र की जनता की रक्षा RSS ने नहीं की थी, बल्कि इसके पीछे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और भारतीय सेना थी। यानी एक तरफ बीएल संतोष RSS कार्यकर्ताओं की भूमिका को सामने रख रहे हैं, तो दूसरी तरफ प्रियांक खरगे उस भूमिका को नकारते हुए तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व और भारतीय सेना को इसका श्रेय दे रहे हैं।

प्रियांक खरगे ने सितंबर 1948 में हुए ‘ऑपरेशन पोलो’ का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हैदराबाद को भारत में शामिल करने के लिए कार्रवाई भारतीय सेना ने की थी, RSS ने नहीं। यहीं से विवाद और ज्यादा गंभीर हो जाता है, क्योंकि अब बहस सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी की नहीं रह जाती, बल्कि इतिहास की अलग-अलग व्याख्याओं तक पहुंच जाती है। एक तरफ RSS की भूमिका का दावा है, तो दूसरी तरफ भारतीय सेना और तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका को प्रमुख बताया जा रहा है।

इसी बीच प्रियांक खरगे ने सरकारी संपत्ति से जुड़े नए विधेयक पर बीजेपी के विरोध को भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि इस बिल में किसी राजनीतिक दल या संगठन का नाम नहीं है। उनके मुताबिक सरकार का उद्देश्य सार्वजनिक संपत्ति के इस्तेमाल को नियमों के दायरे में लाना और सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्ट के आदेशों को लागू करना है। खरगे ने कहा कि निजी कार्यक्रमों के लिए अनुमति जरूरी होनी चाहिए, ताकि आम जनता को किसी तरह की परेशानी न हो। उन्होंने बीजेपी के विरोध को राजनीतिक बताते हुए कहा कि विपक्ष बिना वजह इस बिल को लेकर डर पैदा कर रहा है।

तो अब तस्वीर काफी साफ है। कर्नाटक से शुरू हुआ RSS के पंजीकरण का विवाद आजादी के इतिहास तक पहुंच गया है, आजादी से विभाजन तक पहुंच गया है, विभाजन से हिंदू आबादी और राष्ट्र की पहचान तक पहुंच गया है और फिर ‘अखंड भारत’ के संकल्प तक जा पहुंचा है। दूसरी तरफ हैदराबाद के इतिहास और ऑपरेशन पोलो को लेकर भी बीएल संतोष और प्रियांक खरगे आमने-सामने हैं। यानी यह सिर्फ दो नेताओं के बीच बयानबाजी नहीं रह गई है, बल्कि संगठन, इतिहास, राष्ट्रवाद और भारत की पहचान को लेकर एक बड़ी राजनीतिक बहस बनती जा रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रियांक खरगे के पलटवार के बाद बीएल संतोष फिर कोई जवाब देंगे? क्या RSS के पंजीकरण का मुद्दा आने वाले दिनों में और बड़ा बनेगा? और क्या ‘अखंड भारत’ वाला बयान कर्नाटक की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बनेगा? क्योंकि फिलहाल इतना तय है कि यह कहानी यहां खत्म नहीं हुई है, बल्कि असली सियासी बहस अब शुरू होती दिखाई दे रही है।

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