दक्षिण एशिया की बदलती आर्थिक और रणनीतिक तस्वीर एक बार फिर चिंता का विषय बनती जा रही है। जहां भारत लगातार मजबूत आर्थिक वृद्धि के साथ आगे बढ़ रहा है, वहीं पाकिस्तान की आर्थिक हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। पाकिस्तान की जीडीपी ग्रोथ करीब 2.7 फीसदी के आसपास है, जबकि भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7 फीसदी या उससे अधिक बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मदद पाकिस्तान को कुछ समय के लिए राहत जरूर देती है, लेकिन इससे उसकी मूल समस्याएं हल नहीं हो पा रही हैं।
आर्थिक दबाव के बीच पाकिस्तान अब उन सेक्टरों में कदम बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जहां भारत पहले से मजबूत स्थिति में है। टेक्सटाइल और कृषि जैसे क्षेत्रों में पाकिस्तान की गतिविधियां तेज हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे क्षेत्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है और इसका असर भारत-पाक व्यापार संतुलन पर भी पड़ सकता है।
इसी कड़ी में पाकिस्तान ने अमेरिका को अपने खनिज संसाधनों तक पहुंच देने का प्रस्ताव रखा है। इसके साथ ही क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े कारोबार को एक ऐसी कंपनी को सौंपे जाने की चर्चा है, जिसका संबंध जैकरी विटकॉफ और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बेटों से बताया जा रहा है। यह कदम पाकिस्तान की बढ़ती आर्थिक मजबूरी और विदेशी निवेश पर उसकी निर्भरता को दर्शाता है।
वहीं दूसरी ओर, वैश्विक स्तर पर भी अस्थिरता का दौर जारी है। ऐसे में सवाल यह नहीं रह गया है कि किस देश को काबू में किया जाए, बल्कि यह है कि उन देशों से कैसे निपटा जाए, जो आर्थिक रूप से कमजोर होकर भी जोखिम भरे कदम उठा सकते हैं।
बांग्लादेश की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। वहां ऊर्जा संकट, बढ़ती महंगाई और निवेशकों के कमजोर होते भरोसे ने हालात मुश्किल बना दिए हैं। पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के संभावित रक्षा समझौते इस ओर इशारा करते हैं कि क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं। कुछ कट्टरपंथी तत्व भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर भड़काऊ बयान दे रहे हैं, जिससे सुरक्षा चिंताएं और बढ़ गई हैं।
भारत ने बांग्लादेश के लिए बंदरगाह, रेल और ऊर्जा ग्रिड से जुड़ी कई कनेक्टिविटी योजनाएं प्रस्तावित की हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एक स्थिर और शांत बांग्लादेश भारत के हित में है, क्योंकि अस्थिरता की स्थिति भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।



