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भारत पर अमेरिकी प्रहार! ट्रम्प ने बताया डेड इकोनॉमी, मोदी की चुप्पी पर देश गुस्से में

अगर दोस्ती में ही धोखा मिल जाए… तो क्या उसे दोस्ती कहा जाएगा? प्रधानमंत्री मोदी ने जब अमेरिका से रिश्तों को ‘गोल्डन एरा’ बताया था, तब देश को भरोसा दिलाया गया था कि भारत को वैश्विक ताकतों के साथ खड़ा किया जा रहा है। लेकिन अब वही अमेरिका हमें ‘डेड इकोनॉमी’ कहकर अपमानित कर रहा है। इधर, संसद में प्रियंका गांधी ने तो सरकार से सीधा भी सवाल किया —
“मोदी जी दोस्त तो बना लेते हैं, लेकिन देश को मिलता क्या है? टैरिफ, प्रतिबंध और नुकसान!” और अब पूरा देश पूछ रहा है — प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं?
एक ऐसा सवाल जो भव्य आयोजनों की चकाचौंध और व्यक्तिगत दोस्ती के दावों के पीछे छिपी हकीकत को कुरेदता है। सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाई-प्रोफाइल विदेश नीति भारत के लिए फायदे का सौदा साबित हुई है? या फिर यह सिर्फ एक महंगा दिखावा है, जिसकी कीमत देश की अर्थव्यवस्था और संप्रभुता चुका रही है?

याद कीजिए वो तस्वीरें… ह्यूस्टन का NRG स्टेडियम… ‘हाउडी मोदी’ का शोर… अहमदाबाद का मोटेरा स्टेडियम… ‘नमस्ते ट्रम्प’ का भव्य आयोजन। प्रधानमंत्री मोदी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दोस्ती के चर्चे दुनिया भर में थे। ऐसा माहौल बनाया गया मानो भारत और अमेरिका के संबंध एक नए स्वर्ण युग में प्रवेश कर चुके हैं।

लेकिन इस दोस्ती के बदले भारत को मिला 25% का भारी-भरकम अमेरिकी टैरिफ, मानते है ट्रम्प अपनी बात पर कभी अडिग नहीं रहते, Yes-no करते-करते उन्होंने चार महीने तो निकाल दिए और अब एक बार फिर उन्होंने भारत पर टैरिफ को 7 दिन के लिए टाल दिया है | लेकिन जब भी ये लागू होगा – स्टील और एल्युमिनियम से लेकर फार्मा, ऑटो पार्ट्स और टेक्सटाइल जैसे महत्वपूर्ण सेक्टरों को इसकी भारी मार झेलनी पड़ेगी | दोस्तों ये वो सेक्टर हैं जो हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, जो करोड़ों लोगों को रोजगार देते हैं, और जिनमें हमारे MSME यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम बड़ी संख्या में काम करते हैं।

सवाल उठता है, जब दोस्ती इतनी गहरी थी, तो व्यापार पर इतनी बड़ी चोट क्यों? क्या हमारी सरकार “अमेरिका फर्स्ट” की नीति को समझने में नाकाम रही? या फिर व्यक्तिगत संबंधों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रख दिया गया? इन टैरिफ ने भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में महंगा कर दिया, हमारे निर्यातकों को भारी नुकसान हुआ और लाखों नौकरियों पर तलवार लटक गई। क्या सरकार इसके लिए तैयार थी? जवाब आज भी अधूरा है।

दोस्तों ये बात सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं है। बात भारत की ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक पकड़ तक जा पहुंची है।

हाल ही में, डोनाल्ड ट्रम्प ने एक चौंकाने वाला बयान दिया। उन्होंने अमेरिका-पाकिस्तान के बीच एक बड़े तेल सौदे का संकेत देते हुए कहा कि हो सकता है एक दिन पाकिस्तान भारत को भी तेल बेचे।

इसे समझिए। जिस पाकिस्तान को भारत आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया में अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है, अमेरिका उसी के साथ ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी साझेदारी कर रहा है। और यह बयान भारत के लिए किसी कूटनीतिक तमाचे से कम नहीं है। यह न केवल हमारी ऊर्जा सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है, बल्कि यह दिखाता है कि अमेरिका अपने हितों के लिए पाकिस्तान को फिर से इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के तौर पर स्थापित कर रहा है। इतना ही नहीं इसी अमेरिका ने हमारी 6 भारतीय कंपनियों पर ईरान के साथ गुप्त व्यापार करने और अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवाद को फंड करने का आरोप लगाकर प्रतिबंध भी लगा दिया।

दोस्तों यह सीधा-सीधा भारत की संप्रभुता पर हमला है। भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र है। हमें किससे व्यापार करना है और किससे नहीं, यह तय करने का अधिकार हमारा अपना है। ईरान हमारा पुराना ऊर्जा साझेदार रहा है। लेकिन अमेरिकी दबाव में हमें ईरान से तेल आयात लगभग बंद करना पड़ा, जिसका खामियाजा हमें महंगी ऊर्जा खरीदकर चुकाना पड़ रहा है। और अब हमारी कंपनियों पर कार्रवाई करके अमेरिका यह संदेश दे रहा है कि भारत को उसकी विदेश नीति के हिसाब से चलना होगा।

यह हमें उस बड़े सवाल पर लाता है जिसका सामना भारत आज कर रहा है।

क्या अमेरिका भारत को उसकी स्वतंत्र विदेश नीति के लिए सज़ा दे रहा है?

एक तरफ भारत BRICS जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ मिलकर डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने और अपनी मुद्रा में व्यापार करने की बात करता है। हम रूस से अमेरिकी धमकियों के बावजूद S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदते हैं। यह हमारी ‘Strategic Autonomy’ यानी ‘सामरिक स्वायत्तता’ का प्रतीक है, जिस पर भारत हमेशा गर्व करता आया है।

लेकिन क्या मोदी सरकार इस स्वायत्तता को बनाए रख पा रही है? या फिर ‘हाउडी मोदी’ जैसे आयोजनों की कीमत हम अपनी सामरिक स्वायत्तता से समझौता करके चुका रहे हैं? एक तरफ हम रूस के साथ खड़े दिखना चाहते हैं, दूसरी तरफ अमेरिकी प्रतिबंधों का डर हमें ईरान जैसे पारंपरिक दोस्तों से दूर कर रहा है। यह विदेश नीति का संतुलन है या एक खतरनाक विरोधाभास?

‘हाउडी मोदी’ और ‘नमस्ते ट्रम्प’ पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हुए। कहा गया कि इससे भारत की छवि मजबूत होगी, निवेश आएगा, और कूटनीतिक लाभ मिलेगा। लेकिन आज जब हम हिसाब-किताब देखते हैं, तो पाते हैं:

टैरिफ मिले।

GSP यानी जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज का दर्जा छिना, जिससे हमारे निर्यातकों को नुकसान हुआ।

पाकिस्तान को अमेरिकी शह मिली।

और हमारी संप्रभुता पर सवाल खड़े हुए।

तो क्या यह सब सिर्फ छवि चमकाने का खेल था? क्या यह विदेश नीति से ज्यादा एक इवेंट मैनेजमेंट था, जिसका मकसद देशहित साधने से ज्यादा एक नेता की व्यक्तिगत छवि को मजबूत करना था?

आज हमें खुद से यह सवाल पूछने की जरूरत है।

क्या एक सफल विदेश नीति का पैमाना भव्य आयोजन और नेताओं के बीच गले मिलना है, या फिर देश के व्यापार, रोजगार और सुरक्षा को मिला ठोस फायदा?

क्या व्यक्तिगत दोस्ती की कीमत राष्ट्रीय हितों की तिलांजलि देकर चुकाई जा सकती है?

और सबसे बड़ा सवाल – क्या प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति भारत की छवि बना रही है, या देश के हितों का सौदा कर रही है?

सोचिएगा ज़रूर।

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